किसान बिल 2020
हमारा देश कृषि प्रधान देश है।देश के विकाn स में सबसे ज्यादा भागीदारी किसान की है। पहले आए दिन किसान-आत्महत्या की खबरें सुनाई देती थी । हालांकि किसान मरता आज भी है लेकिन उसकी ख़बर अब नहीं आती। किसान की आय बहुत कम होती है जितना लागत वो खेती करने में लगाता है उतना उसको नही मिलता जिसकी वजह से उसे कर्ज लेना पड़ता है। परिस्थिति अनुकूल होने के कारण. किसान कर्ज वापस करने के लिए अपना खेत बेच देता है। और वह पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है ।मरने के अलावा उसके पास विकल्प नही बचता। आत्महत्या करना साधारण बात हो गयी है लेकिन जब कारण सामान्य हो तब ये चिन्ता का विषय हो जाता है। सरकार ने किसान के बारे में 2014 में ही सोच लिया था ।2020 में किसानों के हित के लिए तीन नए कानून लागू किये। विपक्ष नें विरोध नहीं जताया लेकिन चर्चा से परहेज किया। 23 सितंबर को दोनों सदनों में इसे पारित कर दिया गया।जिसके विरोध में 27 सितंबर से पंजाब के किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया। उस वक्त हमारी जागरूक मीडिया सुशांत को इंसाफ दिलाने के बाद दीपिका पादुकोण के ऊपर ड्रग्स लेने के आरोप की जानकारी सांझा कर के दर्शकों को जागरूक करने में व्यस्त थी। धीरे- धीरे प्रदर्शन हरयाणा से होकर दिल्ली बॉर्डर तक पहुँच गया। दिल्ली पहुँचने पर किसानों के साथ विपक्ष भी शामिल हो गये जो एक महीनें पहले जैसे इसी दिन के इंतजार में थे। मीडिया जब सारे महत्वपूर्ण मामलेंं कवर कर चुकी तब उसनें अपना रुख किसान आंदोलन की ओर किया। किसानों नें चंद मीडिया चैनेलों का बहिष्कार कर उन्हें ज़ोर का तमाचा मारा है। 2020 में यही एक बात देश के निष्पक्ष ख़बर सुननें वालों के लिए मनमोहक है। फिलहाल प्रदर्शनकारियों को दिल्ली आए एक महीनें से ऊपर हो चुका है । 31 दिनों से चल रहे केंद्र कृषि- बिल विरोध प्रदर्शन में किसान थमते नही दिख रहें। पांच बार केंद्र सरकार और किसान के बीच वार्ता हुई, जिसका कोई भी नतीजा नही निकल पाया।
सरकार के ओर से लिखित में न्यूनतम समर्थन मूल्य और मंडी व्यवस्था बनी रहने का आश्वासन भी दिया गया।
किसान की सीधी मांग है तीनों कृषि - बिल को सरकार वापस ले लें । इससे कम में वो नही मानने वाले, वही सरकार संशोधन करने को तैयार है लेकिन बिल वापस नहीं लेगी। 8 दिसम्बर को संयुक्त किसान मोर्चा नें भारत बंद करने का एलान किया था।23 दिसम्बर को किसान दिवस था । 25 दिसम्बर को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में सम्बोधन करते हुए 18,000 करोड़ रुपये किसानों को दिए।( 2000 प्रति किसान)।30 दिसम्बर किसानों द्वारा ट्रैक्टर मार्च निकाला गया ।विपक्ष भी प्रदर्शन में शामिल होकर बहती गंगा में अपने हाथ धो रही हैं।
केंद्र सरकार विपक्ष पर किसानों को बरगालानें का आरोप लगा रही है।रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किसानों को सलाह दिया कि एक-दो साल बिल को देख लें और ना ठीक लगे तो उन्हें प्रधानमंत्री के नियत पर पूरा भरोसा है कानून वापस हो जाएंगे।
( पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें।)
बिल किसान के हित के लिए है, लेकिन किसान को इसमें अपना हित नहीं नज़र आ रहा है। सरकार के तरफ से आश्ववासन तो दिया गया है लेकिन क़ानून में लिखित देंने से परहेज कर रहीं है। सरकार किसान की बात सुन रही , प्रतिक्रिया भी कर रही ,लेकिन मान नहीं रही हैं। फिर किसान भी अड़ गए है बिल वापसी को लेकर जो कि छोटी बात नही संशोधन किया जा सकता है वापस किया जाना उचित नहीं। किसान बिल के समर्थक किसानों के प्रदर्शन को कभी विपक्ष की चाल बता देंं रहें तो कभी खालिस्तान की मांग। प्रतिपक्ष इन बातों को खारिज कर रहा है, और उसका मानना है कि ये बिल किसान हित में नहीं बल्कि प्राइवेट कंपनी के हित के लिए है। चार साल पहले अप्रैल 2016 में सरकार द्वारा 'इनाम' लॉच किया गया, 21 मंडियों से इसकी शुरुआत हुई। अभी तक पूरे देश की मंडियों से नही जुड़ सकी है। इस ऑनलाइन प्लेटफार्म के माध्य्म से 'वन नेशन वन मार्केट' के उद्देश्य से किसान अपने फसल को एक राज्य से दूसरे राज्य में बेच सकेगा। इससे बिचैलियों का खात्मा होगा और किसानों का मुनाफा होगा। ज़मीनी हकीकत यह है कि किसान देश का सबसे भोला-भाला वर्ग है।और गाँव का रहने वाला है। देश के बहुत से गाँव ऐसे है जहाँ मोबाइल नेटवर्क नही है और बहुत से किसान को मोबाइल की जानकारी नहीं है।इस सुविधा का इस्तेमाल वो कैसे कर पाएंगे या कर रहे हैं यह बता पाना आसान नहीं। लेकिन ये सोच अच्छी है, लेकिन इसे ज़मीनी स्तर पर सफल करना सरकार की परीक्षा होगी। फिलहाल सरकार की तरफ से नतीज़े अच्छे आ रहें हैं । तीनों बिल सही है या गलत इसको सही से कोई ना समझा पा रहा और ना कोई समझ पा रहा। विरोध करने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य की गुहार लगा रहें और समर्थक ऐसे मांग को देशविरोधी बता रहे हैं।
किसानों की समस्या गम्भीर हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य का आश्वाशन प्रशासन कर तो रहा है। लेकिन बिल में लिखने को तैयार नही हैं। जिसके पीछे बहुत बड़ा कारण है। पहला बिल पूरी तरह से ठीक है की किसान अपनी फसल मंडी से बहार बेच सकतें है लेकिन किसान कितने में बेचेगा ? क्या उसको उसकी लागत तक का मिल पायेगा? मंडी व्यवस्था खत्म होने पर किसान पूरी तरह से निजी कंपनी पर निर्भर हो जाएगा,जिससे उसका शोषण होगा। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में कंपनी किसान से 20 रूपये प्रति आलू उत्पाद तय करेगी तो किसान को अपने खेत मे आलू उगाना होगा और लागत लगानी होगी जब किसान कंपनी को बेचेगा तो 20 रुपये प्रति आलू ही बेचेगा भले बजार में एक आलू का दाम 40 हो। तो किसान का इससे मुनाफा होगा या घाटा ? इसमें संशोधन करने की जरूरत है।अब कुछ उत्पाद को essential commodities से हटा दिया गया है इसका मतलब कंपनी सीमा से ज्यादा तक उत्पाद का स्टॉक इकट्ठा कर सकती है और जब बाजार में उस उत्पाद की किल्लत होगी तो आसामां छूते दामों पर बेच के देश में महंगाई की समस्या उतपन्न कर सकतीं है। और सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नही होगा।कुछ पैमाने बनाए गए है सरकार के हस्तक्षेप पर लेकिन क्या वे काफी है? यही हाल कोरोना काल में हुआ था 100 रुपये की मास्क ,सेनिटाइजर 200 तक मे बिकनें लगी थी तब सरकार ने इसी नियम के तहत आसेंशियल उत्पाद के दामों को नियंत्रण किया था।
बिल से पहले समस्या यह है कि देश में जब भी कोई कानून लागू होता है तो उसका जनहित में सही से संचारण होना भी अनिवार्य है। अन्यथा इसी प्रकार के आसामंजस्य के कारण प्रदर्शन होते रहंगे।इस बिल का भविष्य आंदोलनकारी के हौसलें पर टिका है।
इस बिल में पप्पू और गप्पू के बीच किसान फँस गया है! दोनों को पक्षियों से लगाव है। गप्पू बा़गान में और पप्पू ट्विटर के मैदान में किसानों के बारे में विचार करते हैं ।
जब पप्पू की सरकार थी उन्होंनें भी यही वादे किए थे, तब गप्पू नें विरोध किया था।
अब जब गप्पू सरकार में हैं ज़ाहिर बात है पप्पू विरोध जताएंगे।
ना पूरी तरह कोई ग़लत है ना कोई सही।
सत्ता का खेल है लेकिन उसमें पिस कौन रहा?
किसान!
Good going...👍
ReplyDeleteKeep it up..👏
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