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Showing posts from September, 2020

कोरोना वुहान से नही तब्लीगी जमात से फैला - जागरूक मीडिया।

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 पूरे विश्व में कोरोना महामारी का कारण चीन का वूहान शहर बताया जाता है। भारत मे भी आया तो वही से था लेकिन मीडिया और सत्ता पक्ष के कुछ मंत्री और विधायक के हिसाब से देश मे कोरोना फैलाने का काम तब्लीगी जमात ने किया। दिन रात एक कर के मीडिया ने तब्लीगी जमात को कठघरे में खड़ा किया न किसी कोर्ट की आवश्यकता पड़ी न ही किसी सबूत की। उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर ने भी तब्लीगी जमात को फटकार लगाई और कहा कि भारत मे कोरोना फैलाव के मुख्य आरोपी तब्लीगी जमात के लोग है इन्हें दंड मिलना ही चाहिए। मीडिया ने पूरी निष्ठा के साथ इस मुद्दे को चलाये रखा जहाँ कोरोना वहां तब्लीगी जमात का नाम सुनाई देने लगा। अखबारों में लेख आने लगे लोग कब तबलीगी जमात से किसी विशेष समुदाय पर सन्देह करने लगे ये दर्शको को पता ही नही चला। सत्ता पक्ष के विधायक जी ने जमात से सीधे मुस्लिम समुदाय पर वार करने लगे और सब्जी को थूक कर बेचे जाने की जानकारी भी दी। इस तरह देश में एक सब्जी बेचने वाले का धर्म पूछा जाने लगा। जो कि ठीक भी है कोई थूका हुआ सब्जी आखिर क्यों खायेगा? और जब खबर सत्ता पक्ष से हो तो किस बात का सन्देह? और मिडिय...

प्रेस कॉन्फ्रेंस का दौर खत्म अब "मन की बात "ही है प्रधानमंत्री पर होने वाले सवालों का जवाब।

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पत्रकारों के सम्मेलन में जब प्रधानमंत्री से सवाल किये जाते थे तो उसका जवाब मिलता था। इससे देश पर कुछ खास फर्क नही पड़ता था लेकिन देश में लोकतंत्र की भावना मजबूत होती थी। प्रधानमंत्री सरकार के बातौर मुखिया प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से देश की जनता को योजनाओं और उनपे लागत का ब्यौरा देते थे। इसके साथ देश के चुनिंदा पत्रकारों को प्रश्न पूछने की अनुमति होती थी। इससे पारदर्शिता भी होती थी और काफी तीखे सवालों का सामना भी करना पड़ता था।देश मे प्रेस कॉन्फ्रेंस का चलन आज भी है लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री को प्रेस कॉन्फ्रेंस कुछ  खास पसंद नही आया। अभी तक उन्होंने मात्र एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की है जिसमे उनसे 19 सवाल दागे गए लेकिन उन्होंने अमित जी को सर्वोपरि बात कर प्रश्न को टाल दिया। फिलहाल ये जरूरी नही की प्रधानमंत्री ही सवालो के जवाव दे लेकिन जब सवाल किसी व्यक्ति विशेष से पूछा जाता है तो जवाब देना महत्वपूर्ण हो जाता है। 6 सालो में एक बार प्रेस कॉन्फ्रेंस, 20 सवालो पर मौन रहे । ये कॉन्फ्रेंस 2019 चुनाव नतीजे के बाद हुई मीडिया को धन्यवाद करने के बाद प्रधानमंत्री ने अपने मुँह में दही ज...

बेचारी हिंदी जी अंग्रेजी बाबू के आगे शर्मा जाती है।

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हमारे देश में अनेक भाषाएँँ बोली जाती है लेकिन सबसे ज्यादा अंग्रेजी बाबू  प्रभावशाली है और हो भी क्यों ना उनकी मान जान जो इतनी है। कहने को तो हिंदी बेचारी हमारी मातृभाषा है लेकिन शाायद ही हम उसे उतनी इज़्ज़त दे पाए है। सरकारी दफ्तर में हिंदी जी अभी तक बहुत आगे नही बढ़ पाई है। उनका इस्तेमाल केवल अंग्रेजी बाबू को ट्रांसलेट कर के किया जाता है। जब आप हिंदी जी को ट्रांसलेट कर के पढ़ेंगे तो वो देखने में लुभावनी लगेंगी लेकिन समझने में कठिन महसूस होंगी। हिंदी जी को व्यवहार में लाने से हम उनका मान जान बढ़ा सकते है न कि केवल अंग्रेजी बाबू को हिंदी में बदल देने से। हिंदी जी की एक अपनी पहचान है हालाकि समाज मे उनकी पहचान पर सवाल उठते रहते है। किसी भी इंसान की बोलचाल ही उसे प्रभावशाली बनाती है अक्सर जब भी हम चार लोगों में किसी व्यक्ति के मुंह से टूटी- फूटी , बेढंग अंग्रेजी बाबू को सुन लेते है तो हमारे अंदर उनके लिए सम्मान की भावना उत्पन्न होती है। वही बेचारी हिंदी जी शर्म से मुंह से निकल ही नही पाती। बचपन से ही अंग्रेजी बाबू को सीखाने के लिए अभिभावक बच्चो को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में दाखिल...