बेचारी हिंदी जी अंग्रेजी बाबू के आगे शर्मा जाती है।



हमारे देश में अनेक भाषाएँँ बोली जाती है लेकिन सबसे ज्यादा अंग्रेजी बाबू  प्रभावशाली है और हो भी क्यों ना उनकी मान जान जो इतनी है। कहने को तो हिंदी बेचारी हमारी मातृभाषा है लेकिन शाायद ही हम उसे उतनी इज़्ज़त दे पाए है। सरकारी दफ्तर में हिंदी जी अभी तक बहुत आगे नही बढ़ पाई है। उनका इस्तेमाल केवल अंग्रेजी बाबू को ट्रांसलेट कर के किया जाता है। जब आप हिंदी जी को ट्रांसलेट कर के पढ़ेंगे तो वो देखने में लुभावनी लगेंगी लेकिन समझने में कठिन महसूस होंगी। हिंदी जी को व्यवहार में लाने से हम उनका मान जान बढ़ा सकते है न कि केवल अंग्रेजी बाबू को हिंदी में बदल देने से। हिंदी जी की एक अपनी पहचान है हालाकि समाज मे उनकी पहचान पर सवाल उठते रहते है। किसी भी इंसान की बोलचाल ही उसे प्रभावशाली बनाती है अक्सर जब भी हम चार लोगों में किसी व्यक्ति के मुंह से टूटी- फूटी , बेढंग अंग्रेजी बाबू को सुन लेते है तो हमारे अंदर उनके लिए सम्मान की भावना उत्पन्न होती है। वही बेचारी हिंदी जी शर्म से मुंह से निकल ही नही पाती। बचपन से ही अंग्रेजी बाबू को सीखाने के लिए अभिभावक बच्चो को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए पहले खुद अंग्रेजी बाबू को सीखते है।बचपन से ही बच्चो को अंग्रेजी सिखाने के चलते खिचड़ी भाषा सिखाने लगते है।"बेटा sleep कर लो", बेटा bath कर लो, "बेटा वो देखो crow"। बचपन में बच्चो की सीखने की क्षमता तीव्र होती है उस समय बच्चा वही सिखेंगा जो उसे सीखाया जाएगा। यही वजह है की बड़े होने पर ना हम ढंग से अंग्रेजी बाबू बन पाते है और ना ही हिंदी जी को सम्मान दिला पाते है। हिंदी जी नही आती तो कोई बात नही लेकिन अंग्रेजी बाबू नही आते तो समाज मे कैसे उन्नति हासिल करेंगे ये सवाल किया जाता है। अंग्रेजी बाबू कोई दुश्मन नही है लेकिन हिंदी जी को नीचा दिखाना ये गलत है। हिंदी जी को सम्मान क्यों नही मिलता? उन्हें पैसे कमाने के जरिये में मीडिया इस्तेमाल करती है सिनेमा विभाग भी सलाना अच्छी कमाई कर लेता है लेकिन जब अदाकारों से सवाल पूछे जाते है तो अंग्रेजी बाबू को इस्तेमाल करते है जिससे यह साबित हो जाये कि वे मॉडर्न है। 

आधुनिक युग मे युवा पीढ़ी हिंदी जी को एकदम भूल चुकी है। हिंदी न आने से उन्हें गर्व और अंग्रेजी न बोल पाने से शर्म महसूस होती है। मैं रोज विद्यालय जाता हूँ। विद्यार्थि ने जब ये बोला था तो लोगो ने कोई भाव नही दिया था बल्कि उसे अनसुना कर दिया। वही जब उसने अंग्रेजी बाबू "I go to the school" बोला तो उसको सम्मान की नजरों से देखा गया। एक बार मैने कहा  मैं  हिंदी बोलती हूँ मुझे अंग्रेजी नही आती। तो मुझे बहुत घण्टो तक अंग्रेजी बाबू के बारे में बताया गया कहा गया की केवल भारत मे ही नही बल्कि  विश्व मे उनका बोलबाला है। इसलिए जितना जल्दी हो सके इनको सीख लो। अन्यथा जीनव में आगे बढ़ने में मुश्किल होगी,फिलहाल ये बात सच भी हुई। हिंदी जी को आम बोलचाल में इस्तेमाल किया जाता है, हम रोज बोलते भी है लेकिन उनका कोई भाव नही है। जब भी हमे समाज मे साबित करना होता है की हम पढ़े लिखे है या मॉडर्न है तो झट से अंग्रेजी के टूटे फुटे चार शब्द जोश के साथ बोल ही देते है। हिदी जी को मानने वाले उन्हें समाज मे इज़्ज़त नही दिला सके। भावी पीढ़ी अब हिंदी जी को शायद ही समझ पाएगी , जिसे समझ आयगी उसे शर्म आएगी। 

मुद्दा ये नही की अंग्रेजी बाबू का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? बल्कि ये है की हिंदी जी को शर्म क्यों आती है? क्या आपको हिंदी जी पर भरोसा नही? क्या इस भाषा मे वो खूबी नही जो अंग्रेजी बाबू में है? क्यों समाज मे हिंदी जी की तुलना में अंग्रेजी बाबू को ज्यादा सम्मान दिया जाता है। क्या हिंदी बोलने वाला अज्ञानी है? भाषा मात्र एक माध्य्म है अपने विचारों को दूसरे के विचारों को समझ और व्यक्त कर पाना। लेकिन क्या हम इस परिभाषा को अपनी जिंदगी में उतार पाए है? क्यों अंग्रेजी बाबू को ज्यादा जान मान मिलती है चाहे उनकी बाते अज्ञानता से भरी हो और वही हिंदी जी मुँह से शर्म के मारे निकल नही पाती चाहें कितनी ज्ञानी हो। 

हमने इस बात को स्वीकार कर लिया है ,किसी को कोई आपत्ति नही है। आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी बाबू को सीखना ही होगा। उसके लिए मा बाप पहले खिचड़ी भाषा सिखाते है फिर अंग्रेजी मीडियम में दाखिला करवा के अंग्रेजी बाबू को बोलना सिखवाते है। भाषा का सम्मान उसके उपयोगकर्ता पर निर्भर होना चाहिए ना कि उपयोगकर्ता का सम्मान भाषा पर। कोई व्यक्ति किसी भी भाषा मे अंट शंट बोले उसे अज्ञानी ही माना जाना चाहिए। 

पता नही कब तक हिंदी जी शर्माती रहेंगी अंग्रेजी बाबू के सामने। आने वाले समय में कही हम इन्हें भूल न जाए। ऐसा होने पर हम अपने मूल आधार को खो देंगे जहाँ से हमने शरुवात की थी। 

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