आजादी
सुकून तो बहुत है इस देश मे लेकिन डर है अकेले जाने का। ये कैसी आजादी है? अकेले जाने से डर लगता है? आजाद हो ? किसके गुलाम हो? डर के? कौन सा डर ? तुम भी जानते हो मैं भी। कुछ हो न जाए। तो फिर साथ का इंतजार करे? लेकिन साथ कोई कब तक देगा? तो क्या ना जाए डर से? ये कब तक होगा? निकलना तो पड़ेगा ही सामना तो होगा ही आज नही तो कल । जब हर पल आपके इर्द गिर्द खतरा हो तो आप जीना नही छोड़ सकते। वैसे कुछ हुआ नही अभी तक लेकिन बुरी नजरो ने बहुत किया वार । ये हकीकत है हमारे समाज का। अगर मुश्किल है रास्ते तो उसको बनवाया जाए या रास्ता बदल दिया जाए? क्या रास्ते बदलने से सब ठीक हो जाएगा? क्या घर मे बैठे रहने से सब ठीक हो जाएगा? कुछ होना चाहिए इसपर लेकिन कैसे होगा? क्या बंदिश और बढ़ा दी जाए? सारे सपनो को दफन कर दिया जाए? चुप रहा जाए? सह लिया जाए? किसी के विचारों को तो नाही रोका जा सकता लेकिन क्या किसी को आजादी छिनने की आजादी मिलनी चाहिए? तो क्या करे खुद के लिए आवाज उठाये? कौन सुनेगा ? सुनेगा तो क्या करेगा? सलाह देगा? घर में रहने की? हद है...